Saturday, December 23, 2006

गामघर




देशिवदेश चइल् गेलन् लोक
बोिरयािवस्तर बाइन्हके
साँझअन्हार खोज्लोसे न भेटत्
केकरा केकरा अाँहा किथ कहबई

मन तइयो पिरते होतइ िक
दुरादरबज्जा, खेतखिरहानके
मालजालके अगर पोरा, घाँसफुस
कएने होतइ एक्को बेर
हाटबजार प जाके मछरी किहयो
अगर िकन्ने होतइ
से थोडे िबसिर जतइ

कतनो होतइ हवाइजहाज प चढल
त गरीबइल थोडे िबसिर पतइ
टाइसुट पहनइत समयमें
लुङगी अा गम्छाके जरूर याद
होतइ अबइत

कतनों ढउवा कमा लेतइ
त जनमधर्ती के याद कतः जाके खिरदतइ
वापस त फेनु अाबहीके हइ

चाहे दु िदनके लेल
घुमे अबउक
अा चाहे
सब िदन के लेल
चिल अबउक
अाबेके त हएबे टा करइ






िगिरजा, माधव, प्रचण्ड सब एक जैसे हैं
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ये तो क्रान्ित है
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